Saturday, March 8, 2008

मन.....I


मन अशांत है... लेकिन खामोश नहीं... मन कि अशांति कठोर आवाजों को चीर देने वाले दावानल में हो गयी है परिवर्तित...... अतीत के मोह.... वर्तमान के भय.... और.. भविष्य कि चिंता ने घेर रख्खा... है मन को तीन ओर से....... भूल गया है मन.... के यही सब कुछ हुआ था पहले.. भी.. वही सब कुछ हो रहा है.. और.. भविष्य मुक्त रहेगा.. इस चिंता से.. यह कोरी कल्पना मात्र है... मोह.. भय.. और चिंता से घिरा मन.. अपने ही धुंधले से अँधेरे में कर रहा है परछाइयों को पकड़ने की कोशिश.....! सार्थक..... किन्तु असंभव... और यही एक मात्र मृगमरीचिका भी तो शेष है.. मन के अंतर्मन में......................I
मैं.......